Friday, October 23, 2026
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दक्षिण अफ्रीका फिलिस्तीनियों का अकेला सच्चा हमदर्द?

श्रुति व्यास
सामूहिक नरसंहार (जेनोसाइड) पर एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता हुआ पड़ा है। और संयोग जो इसकी 75वीं वर्षगाँठ के एक महीने बाद समझौते की सार्थकता, उसके व्यावहारिक इस्तेमाल की परीक्षा का मौका सामने आया है।अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के मुख्यालय हेग में इजराइल के गाजा पर हमलों पर सुनवाई शुरू हुई है। दक्षिण अफ्रीका ने विश्व अदालत में इजराइल के खिलाफ नरसंहार का मुकदमा शुरू किया है। दो दिनों तक चलने वाली सार्वजनिक सुनवाई शुरू हुई है।

दक्षिण अफ्रीका पहला देश है जिसने आईसीजे में इजराइल के खिलाफ प्रकरण दायर किया है।प्रकरण में कहा गया है कि सात अक्टूबर को हमास के हमले में इजराइलियों के मारे जाने का बदला लेने के लिए इजराइल की हुई सैन्य कार्यवाही में उसने लोगों का सामूहिक नरसंहार किया है। इजराइल द्वारा गाजा में अंधाधुध बमवर्षा की गयी और वहां पानी, भोजन सामग्री और दवाईयों की सप्लाई बलपूर्वक रोकी गयी।इजराइल की कार्यवाही में 7 अक्टूबर के बाद से अब तक 10,000 बच्चों सहित 23,000 से अधिक लोगमारे जा चुके हैं। दक्षिण अफ्रीका ने 84 पेजों में गाजा में बरती गई निर्दयता के विस्तृत साक्ष्य अदालत को दिए हैं और न्यायालय से कहा है कि वह अविलंब घोषणा करे कि इजराइल ने 7 अक्टूबर के बाद से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत अपनी जिम्मेदारियों का उल्लंघन किया है।‘‘ये सारी कारगुजारियां इजराइल की हैं, जो नरसंहार रोकने में विफल रहा और वह जेनोसाईड घोषणापत्र की पालना की बजाय उसका उल्लंघन कर नरसंहार कर रहा है,।

सवाल है भला दक्षिण अफ्रीका ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में गुहार क्यों लगाई? दरअसल दक्षिण अफ्रीका हमेशा से फिलिस्तीनियों से जुड़े मुद्दों में उनका समर्थन करता रहा है।दक्षिण अफ्रीका के सत्ताधारी दल अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के गाजा के लोगों, फिलिस्तीन और फिलिस्तीन के मुक्ति आंदोलनों से बहुत पुराने संबंध हैं।इसकी वजह यह है कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस स्वयं भी एक समय प्रतिबंधित संगठन था जिसने दक्षिण अफ्रीका की नस्लवादी-रंगभेदी सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था।उसे फिलिस्तीनियों की तकलीफों में अपने कष्ट नजर आते हैं।इसके अलावा, दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला पूर्व फिलिस्तीनी नेता यासेर अराफात के नजदीकी मित्र थे और उन्होंने अपने 1997 के भाषण में यह बहुचर्चित बात कही थी कि जबतक फिलिस्तीनी आजाद नहीं होते तब तक दक्षिण अफ्रीका की आजादी अधूरी रहेगी।दक्षिण अफ्रीका की मौजूदा पहल के पीछे यही नजरिया है।एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह है कि दक्षिण अफ्रीका में इस साल चुनाव होने हैं और इसलिए सत्ताधारी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा समर्थन जुटाना चाहती है।

इजराइल, जो 1948 के अंतर्राष्ट्रीय नरसंहार विरोधी समझौते का हस्ताक्षरकर्ता है, इन आरोपों को दृढ़ता से नकार  रहा है।जब दिसंबर में यह प्रकरण दायर किया गया था तब इजराइल के राष्ट्रपति आईजेक हर्टजोग ने कहा था ‘‘इस दावे से अधिक घटिया और बेतुका और कुछ नहीं हो सकता”। उन्होंने हमास के एजेंडे का जिक्र करते हुए कहा “वह यहूदियों के इकलौते देश इजराइल के सर्वनाश का आव्हान करना चाहता है”।तेल अबीब के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए वाशिंगटन ने भी इन आरोपों को आधारहीन बताते हुए खारिज किया है।संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते अमेरिका सच्चाई को झुठलाने के लिए अपने वीटो का प्रयोग कर सकता है (और संभवत: करेगा भी)।लेकिन इससे न केवल इजराइल और अमेरिका दोनों की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचेगा बल्कि विश्व राजनीति में उनका प्रभाव भी घटेगा।

दक्षिण अफ्रीकान तो इस युद्ध में शामिल है और ना ही उसे इससे कोई सीधा नुकसान हो रहा है। मगर उसने फिर भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। ऐसे मामले दुर्लभ ज़रूर हैं मगर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।ऐसी ही मिसाल 2019 में गाम्बिया ने भी कायम की थी जब उसने आईजीसे में म्यांमार पर रोहिंग्याओं के नरसंहार का आरोप लगाते हुए उसके खिलाफ प्रकरण दायर किया था। सन 2021 में न्यायालय ने तात्कालिक तौर पर म्यांमार की सैन्य सरकार को हिदायत दी थी कि वह अपने सैन्य बलों को नरसंहार न करने का निर्देश देऔर सभी साक्ष्यों को सुरक्षित रखे।इसके अगले वर्ष, आईसीजे के न्यायाधीशों के पैनल ने 15-1 (केवल एक चीनी जज असहमत थे) के बहुमत से फैसला दिया कि गाम्बिया को नरसंहार समझौते में शामिल ‘एर्गा ओमनेस’ (अर्थात हर देश का व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रति कर्तव्य या दायित्व) सिद्धांत के अंतर्गत यह प्रकरण दायर करने का अधिकार था।गाम्बिया द्वारा प्रकरण दायर करने के पहले आईसीजे ने नरसंहार के मुद्दे पर कभी-कभार ही सुनवाई की है।सन् 2007 में न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि सर्बिया,1995 में बोस्निया एवं हर्जेगोविना के सब्रेनिका में नरसंहार रोकने में विफल रहा।

आज दो युद्धों के चलते दुनिया की व्यवस्था पंगु सी है।यूक्रेन द्वारा रूस के खिलाफ फरवरी 2022 में दायर प्रकरण लंबित है।और इस बात की प्रबल संभावना है कि इजराइल के खिलाफ दायर यह प्रकरण भी लंबे समय तक चलेगा और फैसला आने में कई साल लग जाएंगे।
लेकिन फिलिस्तीन के समर्थन में अभियान चलाने वालों को उम्मीद है कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय गाजा में इजराइल की विध्वंसक सैन्य कार्यवाहियों को संभवत: रूकवा सकेगा।न्यायालय के फैसलों का पालन करना हालांकि अनिवार्य होता है किंतु उसके पास इन्हें लागू करवाने की अधिक शक्ति नहीं है।सन् 2004 में न्यायालय ने एक अबंधनकारी सलाह दी थी कि इजराइल द्वारा कब्जे वाले पश्चिमी किनारे में सुरक्षा अवरोधों का निर्माण अवैधानिक है और इन्हें हटाया जाना चाहिए।पर बीस साल बादआज भी दीवारें और बाड़ें कायम हैं।

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